भगत रामानंद का जीवन और रूपक संदेश।

भगत रामानंद का जन्म १३६६ ईस्वी में हुआ और चौदह सौ सितासिस ईस्वी में वह फ़ानी संसार से चले गये। उनके कसीदों में दर्ज है कि रामानंद ने छोटी आयु में अपना घर छोड़ दिया और त्यागी बन गये। बाद में वैदिक ग्रंथों और रामानुज के विशिष्ट-अद्वैत दर्शन के अध्ययन के लिये वाराणसी में वस गये। संत रामानंद को भक्ति लहर में उत्तर और दक्षिण के बीच में सेतु माना जाता है। भगत रामानंद के दौर में जातीय भेदभाव ने भारतीय समाज की जड़ों को खोखला कर दिया था। उन्होंने नीची जात और मुसलमान तबके से जुड़े लोगों को अपने शिष्य बना कर समाज के नियमों को तोड़ा। संत रामानंद ने बताया कि अपने अंदरूनी ज्ञान द्वारा बंदगी के रास्ते पर चलना चाहिये। उन्होंने जप-तप और कर्म-कांड को बेमायना करार दिया।

 

भगत रामानंद का रूहानी संदेश गुरु ग्रंथ साहिब में उनके १ सबद में दर्ज है।

भगत रामानंद की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

निर्धारित संगीत-शास्त्र में सभी सबद अब उपलब्ध हैं।

सबदों की रूपक व्याख्याएँ दिसंबर २०२७ तक प्रकाशित होती रहेंगी।

भगत रामानंद – सबद १

कत जाईऐ रे घर लागो रंगु ॥

रागु बसंतु हिंडोलु, भगत रामानंद, गुरु ग्रंथ साहिब, ११९५