भगत त्रिलोचन का जीवन और रूपक संदेश।

भगत त्रिलोचन का जन्म १२६९ ईस्वी में सौदागर बिरादरी के घर हुआ। हिंदू जाति प्रथा के मुताबिक वह वैश्य थे जो तीन उच्च जातियों में शामिल हैं। भगत त्रिलोचन के जन्म स्थान के बारे में कोई सहमति नहीं है। कुछ इतिहासकारों का दावा है कि उनका गांव महाराष्ट्र राज्य में बार्शी था। कुछ अन्य इतिहासकारों ने ज़िक्र किया है कि उनका जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ पर उन्होंने अपना जीवन बार्शी में गुज़ारा। भगत त्रिलोचन ने पदार्थवाद की जगह भक्ति, मोहब्बत और बंदगी को महत्वपूर्ण माना।

 

भगत त्रिलोचन का रूहानी संदेश गुरु ग्रंथ साहिब में उनके ४ सबदों में दर्ज है।

भगत त्रिलोचन की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

निर्धारित संगीत-शास्त्र में सभी सबद अब उपलब्ध हैं।

सबदों की रूपक व्याख्याएँ दिसंबर २०२७ तक प्रकाशित होती रहेंगी।

भगत त्रिलोचन – सबद १

माइआ मोहु मनि आगलड़ा प्राणी जरा मरणु भउ विसरि गइआ ॥

माइआ मोहु मनि आगलड़ा प्राणी जरा मरणु भउ विसरि गइआ ॥

भगत त्रिलोचन – सबद २

अंतरु मलि निरमलु नही कीना बाहरि भेख उदासी ॥

रागु गूजरी, भगत त्रिलोचन, गुरु ग्रंथ साहिब, ५२५

भगत त्रिलोचन – सबद ३

अंति कालि जो लछमी सिमरै ऐसी चिंता महि जे मरै ॥

रागु गूजरी, भगत त्रिलोचन, गुरु ग्रंथ साहिब, ५२६

भगत त्रिलोचन – सबद ४

नाराइण निंदसि काइ भूली गवारी ॥

रागु धनासरी, भगत त्रिलोचन, गुरु ग्रंथ साहिब, ६९५