भगत सूरदास का जीवन और रूपक संदेश।

भगत सूरदास की पहचान के बारे में कई तरह के विचार हैं। उनका जन्म १५२९ ईस्वी में हुआ। कुछ लिखतों में दर्ज है कि वह ब्राहमण थे और उनका नाम मदन मोहन था और उपनाम सूरदास था। सबसे माननीय बयान यही है कि वह नाबीना थे और रूहानी शायर थे जो संस्कृति संस्कृत और फारसी जानते थे। उनको फ़कीरों की संगत में और रूहानी शायरी जोड़ने में सुकून मिलता था। माना जाता है कि उन्होंने अपनी आख़िरी सांस वाराणसी में ली।

 

भगत सूरदास का रूहानी संदेश गुरु ग्रंथ साहिब में उनके १ सबद में दर्ज है।

भगत सूरदास की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

निर्धारित संगीत-शास्त्र में सभी सबद अब उपलब्ध हैं।

सबदों की रूपक व्याख्याएँ दिसंबर २०२७ तक प्रकाशित होती रहेंगी।

भगत सूरदास – सबद १

छाडि मन हरि बिमुखन को संगु ॥

रागु सारंग, भगत सूरदास, गुरु ग्रंथ साहिब, १२५३