भगत कबीर का जीवन और रूपक संदेश
भगत कबीर भक्ति लहर के इंक़लाबी संतों में सबसे ज़्यादा हवाला दिये जाने वालों में शामिल हैं। वह एक ग़रीब जुलाहा परिवार से थे और अपने समय के सबसे प्रसिद्ध तर्ज़मानों में शुमार थे। उनका जन्म वाराणसी में वर्ष १३९८ ईस्वी में हुआ था। भगत कबीर को बचपन में ग़रीबी में जीवन गुज़ार रहे एक मुस्लिम परिवार ने पाला था। नीरू और नीमा उनके पालन करने वाले माता-पिता थे जो जुलाहे का काम करते थे। भगत कबीर ने सन्यास के मुकाबले में गृहस्थ का मार्ग चुना और जुलाहे के तौर पर कमाई करते हुये सांसारिक दायित्वों का निर्वाह किया। इस दौरान उनका ध्यान रूहानी गहराइयों में उतरा रहता था। भगत कबीर इंकलाबी थे। उन्होंने मज़हबी इंतज़ामिया, मज़हबी अदाराबंदी और कर्मकांडों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। इन्हें वह ख़्यालों की घेराबंदी मानते थे और यह उन्हें ज्ञान प्राप्ति के राह में रोक लगाते थे।
भगत कबीर का रूहानी संदेश गुरु ग्रंथ साहिब में उनके ४७२ सबदों में दर्ज है।
भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ
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भगत कबीर सबद (१ - २०)


