भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ
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दार्शनिक गुरुओं के सबदों के रूपक संदेश
पृष्ठ १६
भगत कबीर सबद (३०१-३२०)
भगत कबीर – सबद ३०१
कबीर रस को गाँडो चूसीऐ गुन कउ मरीऐ रोइ ॥
सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६८
भगत कबीर – सबद ३०२
कबीर गागरि जल भरी आजु कालि् जैहै फूटि ॥
भगत कबीर – सबद ३०३
कबीर कूकरु राम को मुतीआ मेरो नाउ ॥
भगत कबीर – सबद ३०४
कबीर जपनी काठ की किआ दिखलावहि लोइ ॥
भगत कबीर – सबद ३०५
कबीर बिरहु भुयंगमु मनि बसै मंतु न मानै कोइ ॥
भगत कबीर – सबद ३०६
कबीर पारस चंदनै तिन्न है एक सुगंध ॥
भगत कबीर – सबद ३०७
कबीर जम का ठेंगा बुरा है ओहु नही सहिआ जाइ ॥
भगत कबीर – सबद ३०८
कबीर बैदु कहै हउ ही भला दारू मेरै वसि ॥
भगत कबीर – सबद ३०९
कबीर नउबति आपनी दिन दस लेहु बजाइ ॥
भगत कबीर – सबद ३१०
कबीर सात समुँदहि मसु करउ कलम करउ बनराइ ॥
भगत कबीर – सबद ३११
कबीर जाति जुलाहा किआ करै हिरदै बसे गुपाल ॥
भगत कबीर – सबद ३१२
कबीर ऐसा को नही मंदरु देइ जराइ ॥
भगत कबीर – सबद ३१३
कबीर ऐसा को नही इहु तनु देवै फूकि ॥
भगत कबीर – सबद ३१४
कबीर सती पुकारै चिह चड़ी सुनु हो बीर मसान ॥
भगत कबीर – सबद ३१५
कबीर मनु पंखी भइओ उडि उडि दह दिस जाइ ॥
सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६९
भगत कबीर – सबद ३१६
कबीर जा कउ खोजते पाइओ सोई ठउरु ॥
भगत कबीर – सबद ३१७
कबीर मारी मरउ कुसंग की केले निकटि जु बेरि ॥
भगत कबीर – सबद ३१८
कबीर भार पराई सिरि चरै चलिओ चाहै बाट ॥
भगत कबीर – सबद ३१९
कबीर बन की दाधी लाकरी ठाढी करै पुकार ॥
भगत कबीर – सबद ३२०
कबीर एक मरंते दुइ मूए दोइ मरंतह चारि ॥
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