भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

सबदों की ऑडियो प्लेलिस्ट निर्धारित संगीत-शास्त्र में सुनें।

पृष्ठ १५

भगत कबीर सबद (२८१-३००)

भगत कबीर – सबद २८१

कबीर बैसनउ की कूकरि भली साकत की बुरी माइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २८२

कबीर हरना दूबला इहु हरीआरा तालु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २८३

कबीर गंगा तीर जु घरु करहि पीवहि निरमल नीरु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २८४

कबीर मनु निरमलु भइआ जैसा गंगा नीरु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २८५

कबीर हरदी पीअरी चूँनाँ ऊजल भाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २८६

कबीर हरदी पीरतनु हरै चून चिहनु न रहाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २८७

कबीर मुकति दुआरा संकुरा राई दसएं भाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २८८

कबीर ऐसा सतिगुरु जे मिलै तुठा करे पसाउ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २८९

कबीर ना मुोहि छानि न छापरी ना मुोहि घरु नही गाउ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २९०

कबीर मुहि मरने का चाउ है मरउ त हरि कै दुआर ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २९१

कबीर ना हम कीआ न करहिगे ना करि सकै सरीरु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २९२

कबीर सुपनै हू बरड़ाइ कै जिह मुखि निकसै रामु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २९३

कबीर माटी के हम पूतरे मानसु राखिओु नाउ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २९४

कबीर महिदी करि घालिआ आपु पीसाइ पीसाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २९५

कबीर जिह दरि आवत जातिअहु हटकै नाही कोइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २९६

कबीर डूबा था पै उबरिओ गुन की लहरि झबकि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २९७

कबीर पापी भगति न भावई हरि पूजा न सुहाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६८

भगत कबीर – सबद २९८

कबीर बैदु मूआ रोगी मूआ मूआ सभु संसारु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६८

भगत कबीर – सबद २९९

कबीर रामु न धिआइओ मोटी लागी खोरि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६८

भगत कबीर – सबद ३००

कबीर ऐसी होइ परी मन को भावतु कीनु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६८