भगत जयदेव का जीवन और रूपक संदेश।

तेरहवीं शताब्दी के भगत जयदेव का जन्म बंगाल के दक्षिणी इलाके के गांव किंदु बिल्वा में हुआ था जिसे अब जयदेव केंदुली कहते हैं। भगत जयदेव के पिता भोजादेव और माता राधादेवी थे। वह बचपन में अनाथ हो गये थे। उन्होंने वैराग्य और निर्लेपता का कलाम लिखा। भगत जयदेव और उनकी पत्नी पद्मावती ने वैवाहिक मित्रता की मिसाल पैदा की। दोनों का झुकाव समस्त समाज के भले की तरफ़ था और उन्होने मिलकर समाज में फैली नाइंसाफ़ी और भेदभाव को चुनौती दी और रिवायतों के ख़िलाफ़ बग़ावत की। कुदरत की रज़ा में राज़ी रहने के असूल को प्रतिबद्ध इस जोड़ी ने पूरी दृढ़ता के साथ 'सती' प्रथा की नाइंसाफ़ी को चुनौती दी। इस निर्मम प्रथा के तहत पत्नी अपने पति की चिंता में जिंदा भस्म हो जाती थी।

 

भगत जयदेव का रूहानी संदेश गुरु ग्रंथ साहिब में उनके २ सबदों में दर्ज है।

सबदों की ऑडियो प्लेलिस्ट निर्धारित संगीत-शास्त्र में सुनें।

भगत जयदेव की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

भगत जयदेव – सबद १

परमादि पुरखमनोपिमं सति आदि भाव रतं ॥

रागु गूजरी, भगत जैदेव, गुरु ग्रंथ साहिब, ५२६

भगत जयदेव – सबद २

चंद सत भेदिआ नाद सत पूरिआ सूर सत खोड़सा दतु कीआ ॥

रागु मारू, भगत जैदेव, गुरु ग्रंथ साहिब, ११०६