भगत परमानंद का जीवन और रूपक संदेश।

भगत परमानंद के बारे में एक ओर ऐसा माना जाता है कि वह महाराष्ट्र राज्य के बार्शी के रहने वाले थे, लेकिन दूसरी ओर उनकी पहचान उत्तर प्रदेश के कन्नौज के ब्राह्मण परमानंद दास के रूप में की जाती है जिनका जन्म शायद१४८३ ईस्वी में हुआ था। सीना-ब-सीना चली आ रही रिवायत बताती है कि संत परमानंद अपने-आपको सारंग बुलाते थे। सारंग वह पंछी है जिसकी सदाबहार प्यास बारिश की बूंद के लिये बहबल रहती है। रूपक के तौर पर उन्हें भी ज्ञान की अनादि प्यास है और वह ख़ुदाई की प्यास बुझाने के लिये बहबल रहते हैं।

 

भगत परमानंद का रूहानी संदेश गुरु ग्रंथ साहिब में उनके १ सबद में दर्ज है।

भगत परमानंद की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

निर्धारित संगीत-शास्त्र में सभी सबद अब उपलब्ध हैं।

सबदों की रूपक व्याख्याएँ दिसंबर २०२७ तक प्रकाशित होती रहेंगी।

भगत परमानंद – सबद १

तै नर किआ पुरानु सुनि कीना ॥

रागु सारंग, भगत परमानंद, गुरु ग्रंथ साहिब, १२५३