भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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भगत कबीर सबद (३२१-३४०)

भगत कबीर – सबद ३२१

कबीर देखि देखि जगु ढूँढिआ कहूँ न पाइआ ठउरु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६९

भगत कबीर – सबद ३२२

कबीर संगति करीऐ साध की अंति करै निरबाहु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६९

भगत कबीर – सबद ३२३

कबीर जग महि चेतिओ जानि कै जग महि रहिओ समाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६९

भगत कबीर – सबद ३२४

कबीर आसा करीऐ राम की अवरै आस निरास ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६९

भगत कबीर – सबद ३२५

कबीर सिख साखा बहुते कीए केसो कीओ न मीतु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६९

भगत कबीर – सबद ३२६

कबीर कारनु बपुरा किआ करै जउ रामु न करै सहाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६९

भगत कबीर – सबद ३२७

कबीर अवरह कउ उपदेसते मुख मै परि है रेतु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६९

भगत कबीर – सबद ३२८

कबीर साधू की संगति रहउ जउ की भूसी खाउ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६९

भगत कबीर – सबद ३२९

कबीर संगति साध की दिन दिन दूना हेतु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६९

भगत कबीर – सबद ३३०

कबीर मनु मूँडिआ नही केस मुँडाए काँइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६९

भगत कबीर – सबद ३३१

कबीर रामु न छोडीऐ तनु धनु जाइ त जाउ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६९

भगत कबीर – सबद ३३२

कबीर जो हम जंतु बजावते टूटि गईं सभ तार ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६९

भगत कबीर – सबद ३३३

कबीर माइ मूँडउ तिह गुरू की जा ते भरमु न जाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६९

भगत कबीर – सबद ३३४

कबीर जेते पाप कीए राखे तलै दुराइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०

भगत कबीर – सबद ३३५

कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै पालिओ बहुतु कुटंबु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०

भगत कबीर – सबद ३३६

कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै राति जगावन जाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०

भगत कबीर – सबद ३३७

कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै अहोई राखै नारि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०

भगत कबीर – सबद ३३८

कबीर चतुराई अति घनी हरि जपि हिरदै माहि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०

भगत कबीर – सबद ३३९

कबीर सुोई मुखु धंनि है जा मुखि कहीऐ रामु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०

भगत कबीर – सबद ३४०

कबीर सोई कुल भली जा कुल हरि को दासु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०