भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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भगत कबीर सबद (१६१-१८०)

भगत कबीर – सबद १६१

जैसे मंदर महि बलहर ना ठाहरै ॥

रागु गोंड, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८७२

भगत कबीर – सबद १६२

कूटनु सोइ जु मन कउ कूटै ॥

रागु गोंड, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८७२

भगत कबीर – सबद १६३

धंनु गुपाल धंनु गुरदेव ॥

रागु गोंड, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८७३

भगत कबीर – सबद १६४

काइआ कलालनि लाहनि मेलउ गुर का सबदु गुड़ु कीनु रे ॥

रागु रामकली, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ९६८

भगत कबीर – सबद १६५

गुड़ु करि गिआनु धिआनु करि महूआ भउ भाठी मन धारा ॥

रागु रामकली, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ९६९

भगत कबीर – सबद १६६

तूँ मेरो मेरु परबतु सुआमी ओट गही मै तेरी ॥

रागु रामकली, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ९६९

भगत कबीर – सबद १६७

संता मानउ दूता डानउ इह कुटवारी मेरी ॥

रागु रामकली, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ९६९

भगत कबीर – सबद १६८

जिह मुख बेदु गाइत्री निकसै सो किउ ब्रहमनु बिसरु करै ॥

रागु रामकली, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ९७०

भगत कबीर – सबद १६९

तरवरु एकु अनंत डार साखा पुहप पत्र रस भरीआ ॥

रागु रामकली, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ९७०

भगत कबीर – सबद १७०

मुँद्रा मोनि दइआ करि झोली पत्र का करहु बीचारु रे ॥

रागु रामकली, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ९७०

भगत कबीर – सबद १७१

कवन काज सिरजे जग भीतरि जनमि कवन फलु पाइआ ॥

रागु रामकली, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ९७०

भगत कबीर – सबद १७२

जिह सिमरनि होइ मुकति दुआरु ॥

रागु रामकली, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ९७१

भगत कबीर – सबद १७३

बंधचि बंधनु पाइआ ॥

रागु रामकली, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ९७१

भगत कबीर – सबद १७४

चंदु सूरजु दुइ जोति सरूपु ॥

रागु रामकली, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ९७२

भगत कबीर – सबद १७५

दुनीआ हुसीआर बेदार जागत मुसीअत हउ रे भाई ॥

रागु रामकली, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ९७२

भगत कबीर – सबद १७६

पडीआ कवन कुमति तुम लागे ॥

रागु मारू, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११०२

भगत कबीर – सबद १७७

बनहि बसे किउ पाईऐ जउ लउ मनहु न तजहि बिकार ॥

रागु मारू, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११०३

भगत कबीर – सबद १७८

रिधि सिधि जा कउ फुरी तब काहू सिउ किआ काज ॥

रागु मारू, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११०३

भगत कबीर – सबद १७९

उदक समुँद सलल की साखिआ नदी तरंग समावहिगे ॥

रागु मारू, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११०३

भगत कबीर – सबद १८०

जउ तुम्म मो कउ दूरि करत हउ तउ तुम मुकति बतावहु ॥

रागु मारू, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११०४