भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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भगत कबीर सबद (१०१-१२०)

भगत कबीर – सबद १०१

पहिला पूतु पिछैरी माई ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८१

भगत कबीर – सबद १०२

बिंदु ते जिनि पिंडु कीआ अगनि कुँड रहाइआ ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८१

भगत कबीर – सबद १०३

तनु रैनी मनु पुन रपि करि हउ पाचउ तत बराती ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८२

भगत कबीर – सबद १०४

सासु की दुखी ससुर की पिआरी जेठ के नामि डरउ रे ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८२

भगत कबीर – सबद १०५

हम घरि सूतु तनहि नित ताना कंठि जनेऊ तुमारे ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८२

भगत कबीर – सबद १०६

जगि जीवनु ऐसा सुपने जैसा जीवनु सुपन समानं ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८२

भगत कबीर – सबद १०७

जउ मै रूप कीए बहुतेरे अब फुनि रूपु न होई ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८३

भगत कबीर – सबद १०८

रोजा धरै मनावै अलहु सुआदति जीअ संघारै ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८३

भगत कबीर – सबद १०९

कीओ सिंगारु मिलन के ताई ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८३

भगत कबीर – सबद ११०

हीरै हीरा बेधि पवन मनु सहजे रहिआ समाई ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८३

भगत कबीर – सबद १११

पहिली करूपि कुजाति कुलखनी साहुरै पेईऐ बुरी ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८३

भगत कबीर – सबद ११२

मेरी बहुरीआ को धनीआ नाउ ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८४

भगत कबीर – सबद ११३

रहु रहु री बहुरीआ घूँघटु जिनि काढै ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८४

भगत कबीर – सबद ११४

करवतु भला न करवट तेरी ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८४

भगत कबीर – सबद ११५

कोरी को काहू मरमु न जानाँ ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८४

भगत कबीर – सबद ११६

अंतरि मैलु जे तीरथ नावै तिसु बैकुँठ न जानाँ ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८४

भगत कबीर – सबद ११७

चारि पाव दुइ सिंग गुँग मुख तब कैसे गुन गईहै ॥

रागु गूजरी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ५२४

भगत कबीर – सबद ११८

मुसि मुसि रोवै कबीर की माई ॥

रागु गूजरी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ५२४

भगत कबीर – सबद ११९

बुत पूजि पूजि हिंदू मूए तुरक मूए सिरु नाई ॥

रागु सोरठि, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ६५४

भगत कबीर – सबद १२०

जब जरीऐ तब होइ भसम तनु रहै किरम दल खाई ॥

रागु सोरठि, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ६५४