भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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भगत कबीर सबद (२४१-२६०)

भगत कबीर – सबद २४१

कबीर बाँसु बडाई बूडिआ इउ मत डूबहु कोइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५

भगत कबीर – सबद २४२

कबीर दीनु गवाइआ दुनी सिउ दुनी न चाली साथि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५

भगत कबीर – सबद २४३

कबीर जह जह हउ फिरिओ कउतक ठाओ ठाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५

भगत कबीर – सबद २४४

कबीर संतन की झुँगीआ भली भठि कुसती गाउ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५

भगत कबीर – सबद २४५

कबीर संत मूए किआ रोईऐ जो अपुने गृहि जाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५

भगत कबीर – सबद २४६

कबीर साकतु ऐसा है जैसी लसन की खानि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५

भगत कबीर – सबद २४७

कबीर माइआ डोलनी पवनु झकोलनहारु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५

भगत कबीर – सबद २४८

कबीर माइआ डोलनी पवनु वहै हिव धार ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५

भगत कबीर – सबद २४९

कबीर माइआ चोरटी मुसि मुसि लावै हाटि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५

भगत कबीर – सबद २५०

कबीर सूखु न एंह जुगि करहि जु बहुतै मीत ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५

भगत कबीर – सबद २५१

कबीर जिसु मरने ते जगु डरै मेरे मनि आनंदु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५

भगत कबीर – सबद २५२

राम पदारथु पाइ कै कबीरा गाँठि न खोल्ल ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब

भगत कबीर – सबद २५३

कबीर ता सिउ प्रीति करि जा को ठाकुरु रामु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५

भगत कबीर – सबद २५४

कबीर प्रीति इक सिउ कीए आन दुबिधा जाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५

भगत कबीर – सबद २५५

कबीर जगु काजल की कोठरी अंध परे तिस माहि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५

भगत कबीर – सबद २५६

कबीर इहु तनु जाइगा सकहु त लेहु बहोरि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५

भगत कबीर – सबद २५७

कबीर इहु तनु जाइगा कवनै मारगि लाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५

भगत कबीर – सबद २५८

कबीर मरता मरता जगु मूआ मरि भी न जानिआ कोइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५

भगत कबीर – सबद २५९

कबीर मानस जनमु दुलंभु है होइ न बारै बार ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २६०

कबीरा तुही कबीरु तू तेरो नाउ कबीरु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६