भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ
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दार्शनिक गुरुओं के सबदों के रूपक संदेश
पृष्ठ ७
भगत कबीर सबद (१२१-१४०)
भगत कबीर – सबद १२१
बेद पुरान सभै मत सुनि कै करी करम की आसा ॥
रागु सोरठि, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ६५४
भगत कबीर – सबद १२२
दुइ दुइ लोचन पेखा ॥
रागु सोरठि, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ६५५
भगत कबीर – सबद १२३
जा के निगम दूध के ठाटा ॥
भगत कबीर – सबद १२४
जिह बाझु न जीआ जाई ॥
भगत कबीर – सबद १२५
किआ पड़ीऐ किआ गुनीऐ ॥
भगत कबीर – सबद १२६
हृदै कपटु मुख गिआनी ॥
रागु सोरठि, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ६५६
भगत कबीर – सबद १२७
बहु परपंच करि पर धनु लिआवै ॥
भगत कबीर – सबद १२८
संतहु मन पवनै सुखु बनिआ ॥
भगत कबीर – सबद १२९
भूखे भगति न कीजै ॥
भगत कबीर – सबद १३०
सनक सनंद महेस समानाँ ॥
रागु धनासरी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ६९१
भगत कबीर – सबद १३१
दिन ते पहर पहर ते घरीआँ आव घटै तनु छीजै ॥
रागु धनासरी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ६९२
भगत कबीर – सबद १३२
जो जनु भाउ भगति कछु जानै ता कउ अचरजु काहो ॥
भगत कबीर – सबद १३३
इंद्र लोक सिव लोकहि जैबो ॥
भगत कबीर – सबद १३४
राम सिमरि राम सिमरि राम सिमरि भाई ॥
भगत कबीर – सबद १३५
बेद कतेब इफतरा भाई दिल का फिकरु न जाइ ॥
रागु तिलंग, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ७२७
भगत कबीर – सबद १३६
अवतरि आइ कहा तुम कीना ॥
रागु सूही, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ७९२
भगत कबीर – सबद १३७
थरहर कंपै बाला जीउ ॥
भगत कबीर – सबद १३८
अमलु सिरानो लेखा देना ॥
भगत कबीर – सबद १३९
थाके नैन स्रवन सुनि थाके थाकी सुँदरि काइआ ॥
रागु सूही ललित, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ७९३
भगत कबीर – सबद १४०
एकु कोटु पंच सिकदारा पंचे मागहि हाला ॥
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