भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

सबदों की ऑडियो प्लेलिस्ट निर्धारित संगीत-शास्त्र में सुनें।

पृष्ठ ५

भगत कबीर सबद (८१-१००)

भगत कबीर – सबद ८१

गज साढे तै तै धोतीआ तिहरे पाइनि तग ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४७६

भगत कबीर – सबद ८२

बापि दिलासा मेरो कीन्ना ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४७६

भगत कबीर – सबद ८३

इकतु पतरि भरि उरकट कुरकट इकतु पतरि भरि पानी ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४७६

भगत कबीर – सबद ८४

जोगी जती तपी संनिआसी बहु तीरथ भ्रमना ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४७६

भगत कबीर – सबद ८५

फीलु रबाबी बलदु पखावज कऊआ ताल बजावै ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४७७

भगत कबीर – सबद ८६

बटूआ एकु बहतरि आधारी एको जिसहि दुआरा ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४७७

भगत कबीर – सबद ८७

हिंदू तुरक कहा ते आए किनि एह राह चलाई ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४७७

भगत कबीर – सबद ८८

जब लगु तेलु दीवे मुखि बाती तब सूझै सभु कोई ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४७७

भगत कबीर – सबद ८९

सनक सनंद अंतु नही पाइआ ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४७८

भगत कबीर – सबद ९०

बाती सूकी तेलु निखूटा ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४७८

भगत कबीर – सबद ९१

सुतु अपराध करत है जेते ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४७८

भगत कबीर – सबद ९२

हज हमारी गोमती तीर ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४७८

भगत कबीर – सबद ९३

पाती तोरै मालिनी पाती पाती जीउ ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४७८

भगत कबीर – सबद ९४

बारह बरस बालपन बीते बीस बरस कछु तपु न कीओ ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४७९

भगत कबीर – सबद ९५

काहू दीन्ने पाट पटंबर काहू पलघ निवारा ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४७९

भगत कबीर – सबद ९६

हम मसकीन खुदाई बंदे तुम राजसु मनि भावै ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८०

भगत कबीर – सबद ९७

गगन नगरि इक बूँद न बरखै नादु कहा जु समाना ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८०

भगत कबीर – सबद ९८

सरपनी ते ऊपरि नही बलीआ ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८०

भगत कबीर – सबद ९९

कहा सुआन कउ सिमृति सुनाए ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८१

भगत कबीर – सबद १००

लंका सा कोटु समुँद सी खाई ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८१