भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ
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दार्शनिक गुरुओं के सबदों के रूपक संदेश
पृष्ठ २१
भगत कबीर सबद (४०१-४२०)
भगत कबीर – सबद ४०१
कबीर कोठी काठ की दह दिसि लागी आगि ॥
सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७३
भगत कबीर – सबद ४०२
कबीर संसा दूरि करु कागद देह बिहाइ ॥
भगत कबीर – सबद ४०३
कबीर संतु न छाडै संतई जउ कोटिक मिलहि असंत ॥
भगत कबीर – सबद ४०४
कबीर मनु सीतलु भइआ पाइआ ब्रहम गिआनु ॥
भगत कबीर – सबद ४०५
कबीर सारी सिरजनहार की जानै नाही कोइ ॥
भगत कबीर – सबद ४०६
कबीर भली भई जो भउ परिआ दिसा गईं सभ भुलि ॥
भगत कबीर – सबद ४०७
कबीरा धूरि सकेलि कै पुरीआ बाँधी देह ॥
सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४
भगत कबीर – सबद ४०८
कबीर सूरज चाँद कै उदै भई सभ देह ॥
भगत कबीर – सबद ४०९
जह अनभउ तह भै नही जह भउ तह हरि नाहि ॥
भगत कबीर – सबद ४१०
कबीर जिनहु किछू जानिआ नही तिन सुख नीद बिहाइ ॥
भगत कबीर – सबद ४११
कबीर मारे बहुतु पुकारिआ पीर पुकारै अउर ॥
भगत कबीर – सबद ४१२
कबीर चोट सुहेली सेल की लागत लेइ उसास ॥
भगत कबीर – सबद ४१३
कबीर मुलाँ मुनारे किआ चढहि साँई न बहरा होइ ॥
भगत कबीर – सबद ४१४
सेख सबूरी बाहरा किआ हज काबे जाइ ॥
भगत कबीर – सबद ४१५
कबीर अलह की करि बंदगी जिह सिमरत दुखु जाइ ॥
भगत कबीर – सबद ४१६
कबीर जोरी कीए जुलमु है कहता नाउ हलालु ॥
भगत कबीर – सबद ४१७
कबीर खूबु खाना खीचरी जा महि अंमृतु लोनु ॥
भगत कबीर – सबद ४१८
कबीर गुरु लागा तब जानीऐ मिटै मोहु तन ताप ॥
भगत कबीर – सबद ४१९
कबीर राम कहन महि भेदु है ता महि एकु बिचारु ॥
भगत कबीर – सबद ४२०
कबीर रामै राम कहु कहिबे माहि बिबेक ॥
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पृष्ठ १९: सबद (३६१-३८०)
पृष्ठ २०: सबद (३८१-४००)
पृष्ठ २१: सबद (४०१-४२०)
पृष्ठ २२: सबद (४२१-४४०)
पृष्ठ २३: सबद (४४१-४६०)
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