भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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भगत कबीर सबद (४०१-४२०)

भगत कबीर – सबद ४०१

कबीर कोठी काठ की दह दिसि लागी आगि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७३

भगत कबीर – सबद ४०२

कबीर संसा दूरि करु कागद देह बिहाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७३

भगत कबीर – सबद ४०३

कबीर संतु न छाडै संतई जउ कोटिक मिलहि असंत ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७३

भगत कबीर – सबद ४०४

कबीर मनु सीतलु भइआ पाइआ ब्रहम गिआनु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७३

भगत कबीर – सबद ४०५

कबीर सारी सिरजनहार की जानै नाही कोइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७३

भगत कबीर – सबद ४०६

कबीर भली भई जो भउ परिआ दिसा गईं सभ भुलि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७३

भगत कबीर – सबद ४०७

कबीरा धूरि सकेलि कै पुरीआ बाँधी देह ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४

भगत कबीर – सबद ४०८

कबीर सूरज चाँद कै उदै भई सभ देह ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४

भगत कबीर – सबद ४०९

जह अनभउ तह भै नही जह भउ तह हरि नाहि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४

भगत कबीर – सबद ४१०

कबीर जिनहु किछू जानिआ नही तिन सुख नीद बिहाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४

भगत कबीर – सबद ४११

कबीर मारे बहुतु पुकारिआ पीर पुकारै अउर ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४

भगत कबीर – सबद ४१२

कबीर चोट सुहेली सेल की लागत लेइ उसास ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४

भगत कबीर – सबद ४१३

कबीर मुलाँ मुनारे किआ चढहि साँई न बहरा होइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४

भगत कबीर – सबद ४१४

सेख सबूरी बाहरा किआ हज काबे जाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४

भगत कबीर – सबद ४१५

कबीर अलह की करि बंदगी जिह सिमरत दुखु जाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४

भगत कबीर – सबद ४१६

कबीर जोरी कीए जुलमु है कहता नाउ हलालु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४

भगत कबीर – सबद ४१७

कबीर खूबु खाना खीचरी जा महि अंमृतु लोनु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४

भगत कबीर – सबद ४१८

कबीर गुरु लागा तब जानीऐ मिटै मोहु तन ताप ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४

भगत कबीर – सबद ४१९

कबीर राम कहन महि भेदु है ता महि एकु बिचारु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४

भगत कबीर – सबद ४२०

कबीर रामै राम कहु कहिबे माहि बिबेक ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४