भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ
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दार्शनिक गुरुओं के सबदों के रूपक संदेश
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भगत कबीर सबद (४६१-४७२)
भगत कबीर – सबद ४६१
कबीर भाँग माछुली सुरा पानि जो जो प्रानी खाँहि ॥
सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७७
भगत कबीर – सबद ४६२
नीचे लोइन करि रहउ ले साजन घट माहि ॥
भगत कबीर – सबद ४६३
आठ जाम चउसठि घरी तुअ निरखत रहै जीउ ॥
भगत कबीर – सबद ४६४
सुनु सखी पीअ महि जीउ बसै जीअ महि बसै कि पीउ ॥
भगत कबीर – सबद ४६५
कबीर बामनु गुरू है जगत का भगतन का गुरु नाहि ॥
भगत कबीर – सबद ४६६
हरि है खाँडु रेतु महि बिखरी हाथी चुनी न जाइ ॥
भगत कबीर – सबद ४६७
कबीर जउ तुहि साध पिरंम की सीसु काटि करि गोइ ॥
भगत कबीर – सबद ४६८
कबीर जउ तुहि साध पिरंम की पाके सेती खेलु ॥
भगत कबीर – सबद ४६९
ढूँढत डोलहि अंध गति अरु चीनत नाही संत ॥
भगत कबीर – सबद ४७०
हरि सो हीरा छाडि कै करहि आन की आस ॥
भगत कबीर – सबद ४७१
कबीर जउ गृहु करहि त धरमु करु नाही त करु बैरागु ॥
सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७
भगत कबीर – सबद ४७२
चिंता भि आपि कराइसी अचिंतु भि आपे देइ ॥
सलोक, सेख फ़रीद, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६
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