भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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भगत कबीर सबद (२६१-२८०)

भगत कबीर – सबद २६१

कबीर झंखु न झंखीऐ तुमरो कहिओ न होइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २६२

कबीर कसउटी राम की झूठा टिकै न कोइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २६३

कबीर ऊजल पहिरहि कापरे पान सुपारी खाहि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २६४

कबीर बेड़ा जरजरा फूटे छेंक हजार ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २६५

कबीर हाड जरे जिउ लाकरी केस जरे जिउ घासु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २६६

कबीर गरबु न कीजीऐ चाम लपेटे हाड ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २६७

कबीर गरबु न कीजीऐ ऊचा देखि अवासु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २६८

कबीर गरबु न कीजीऐ रंकु न हसीऐ कोइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २६९

कबीर गरबु न कीजीऐ देही देखि सुरंग ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २७०

कबीर लूटना है त लूटि लै राम नाम है लूटि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २७१

कबीर ऐसा कोई न जनमिओ अपनै घरि लावै आगि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २७२

को है लरिका बेचई लरिकी बेचै कोइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २७३

कबीर इह चेतावनी मत सहसा रहि जाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २७४

कबीर मै जानिओ पड़िबो भलो पड़िबे सिउ भल जोगु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २७५

कबीर लोगु कि निंदै बपुड़ा जिह मनि नाही गिआनु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २७६

कबीर परदेसी कै घाघरै चहु दिसि लागी आगि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २७७

कबीर खिंथा जलि कोइला भई खापरु फूट मफूट ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६६

भगत कबीर – सबद २७८

कबीर थोरै जलि माछुली झीवरि मेलिओ जालु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २७९

कबीर समुँदु न छोडीऐ जउ अति खारो होइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७

भगत कबीर – सबद २८०

कबीर निगुसाँएं बहि गए थाँघी नाही कोइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६७