भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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भगत कबीर सबद (३४१-३६०)

भगत कबीर – सबद ३४१

कबीर है गइ बाहन सघन घन लाख धजा फहराहि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०

भगत कबीर – सबद ३४२

कबीर सभु जगु हउ फिरिओ माँदलु कंध चढाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०

भगत कबीर – सबद ३४३

मारगि मोती बीथरे अंधा निकसिओ आइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०

भगत कबीर – सबद ३४४

बूडा बंसु कबीर का उपजिओ पूतु कमालु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०

भगत कबीर – सबद ३४५

कबीर साधू कउ मिलने जाईऐ साथि न लीजै कोइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०

भगत कबीर – सबद ३४६

कबीर जगु बाधिओ जिह जेवरी तिह मत बंधहु कबीर ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०

भगत कबीर – सबद ३४७

कबीर हंसु उडिओ तनु गाडिओ सोझाई सैनाह ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०

भगत कबीर – सबद ३४८

कबीर नैन निहारउ तुझ कउ स्रवन सुनउ तुअ नाउ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०

भगत कबीर – सबद ३४९

कबीर सुरग नरक ते मै रहिओ सतिगुर के परसादि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०

भगत कबीर – सबद ३५०

कबीर चरन कमल की मउज को कहि कैसे उनमान ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०

भगत कबीर – सबद ३५१

कबीर देखि कै किह कहउ कहे न को पतीआइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०

भगत कबीर – सबद ३५२

कबीर चुगै चितारै भी चुगै चुगि चुगि चितारे ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१

भगत कबीर – सबद ३५३

कबीर अंबर घनहरु छाइआ बरखि भरे सर ताल ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१

भगत कबीर – सबद ३५४

कबीर चकई जउ निसि बीछुरै आइ मिलै परभाति ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१

भगत कबीर – सबद ३५५

कबीर रैनाइर बिछोरिआ रहु रे संख मझूरि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१

भगत कबीर – सबद ३५६

कबीर सूता किआ करहि जागु रोइ भै दुख ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१

भगत कबीर – सबद ३५७

कबीर सूता किआ करहि उठि कि न जपहि मुरारि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१

भगत कबीर – सबद ३५८

कबीर सूता किआ करहि बैठा रहु अरु जागु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१

भगत कबीर – सबद ३५९

कबीर संत की गैल न छोडीऐ मारगि लागा जाउ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१

भगत कबीर – सबद ३६०

कबीर साकत संगु न कीजीऐ दूरहि जाईऐ भागि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१