भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ
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दार्शनिक गुरुओं के सबदों के रूपक संदेश
पृष्ठ १८
भगत कबीर सबद (३४१-३६०)
भगत कबीर – सबद ३४१
कबीर है गइ बाहन सघन घन लाख धजा फहराहि ॥
सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७०
भगत कबीर – सबद ३४२
कबीर सभु जगु हउ फिरिओ माँदलु कंध चढाइ ॥
भगत कबीर – सबद ३४३
मारगि मोती बीथरे अंधा निकसिओ आइ ॥
भगत कबीर – सबद ३४४
बूडा बंसु कबीर का उपजिओ पूतु कमालु ॥
भगत कबीर – सबद ३४५
कबीर साधू कउ मिलने जाईऐ साथि न लीजै कोइ ॥
भगत कबीर – सबद ३४६
कबीर जगु बाधिओ जिह जेवरी तिह मत बंधहु कबीर ॥
भगत कबीर – सबद ३४७
कबीर हंसु उडिओ तनु गाडिओ सोझाई सैनाह ॥
भगत कबीर – सबद ३४८
कबीर नैन निहारउ तुझ कउ स्रवन सुनउ तुअ नाउ ॥
भगत कबीर – सबद ३४९
कबीर सुरग नरक ते मै रहिओ सतिगुर के परसादि ॥
भगत कबीर – सबद ३५०
कबीर चरन कमल की मउज को कहि कैसे उनमान ॥
भगत कबीर – सबद ३५१
कबीर देखि कै किह कहउ कहे न को पतीआइ ॥
भगत कबीर – सबद ३५२
कबीर चुगै चितारै भी चुगै चुगि चुगि चितारे ॥
सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१
भगत कबीर – सबद ३५३
कबीर अंबर घनहरु छाइआ बरखि भरे सर ताल ॥
भगत कबीर – सबद ३५४
कबीर चकई जउ निसि बीछुरै आइ मिलै परभाति ॥
भगत कबीर – सबद ३५५
कबीर रैनाइर बिछोरिआ रहु रे संख मझूरि ॥
भगत कबीर – सबद ३५६
कबीर सूता किआ करहि जागु रोइ भै दुख ॥
भगत कबीर – सबद ३५७
कबीर सूता किआ करहि उठि कि न जपहि मुरारि ॥
भगत कबीर – सबद ३५८
कबीर सूता किआ करहि बैठा रहु अरु जागु ॥
भगत कबीर – सबद ३५९
कबीर संत की गैल न छोडीऐ मारगि लागा जाउ ॥
भगत कबीर – सबद ३६०
कबीर साकत संगु न कीजीऐ दूरहि जाईऐ भागि ॥
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पृष्ठ २२: सबद (४२१-४४०)
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