भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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भगत कबीर सबद (१८१-२००)

भगत कबीर – सबद १८१

जिनि गड़ कोट कीए कंचन के छोडि गइआ सो रावनु ॥१॥

रागु मारू, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११०४

भगत कबीर – सबद १८२

देही गावा जीउ धर महतउ बसहि पंच किरसाना ॥

रागु मारू, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११०४

भगत कबीर – सबद १८३

अनभउ किनै न देखिआ बैरागीअड़े ॥

रागु मारू, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११०४

भगत कबीर – सबद १८४

राजन कउनु तुमारै आवै ॥

रागु मारू, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११०५

भगत कबीर – सबद १८५

गगन दमामा बाजिओ परिओ नीसानै घाउ ॥

रागु मारू, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११०५

भगत कबीर – सबद १८६

दीनु बिसारिओ रे दिवाने दीनु बिसारिओ रे ॥

रागु मारू, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११०५

भगत कबीर – सबद १८७

रामु सिमरु पछुताहिगा मन ॥

रागु मारू, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११०६

भगत कबीर – सबद १८८

उसतति निंदा दोऊ बिबरजित तजहु मानु अभिमाना ॥

रागु केदारा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११२३

भगत कबीर – सबद १८९

किनही बनजिआ काँसी ताँबा किनही लउग सुपारी ॥

रागु केदारा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११२३

भगत कबीर – सबद १९०

री कलवारि गवारि मूढ मति उलटो पवनु फिरावउ ॥

रागु केदारा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११२३

भगत कबीर – सबद १९१

काम क्रोध तृसना के लीने गति नही एकै जानी ॥

रागु केदारा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११२३

भगत कबीर – सबद १९२

टेढी पाग टेढे चले लागे बीरे खान ॥

रागु केदारा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११२४

भगत कबीर – सबद १९३

चारि दिन अपनी नउबति चले बजाइ ॥

रागु केदारा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११२४

भगत कबीर – सबद १९४

इहु धनु मेरे हरि को नाउ ॥

रागु भैरउ, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११५७

भगत कबीर – सबद १९५

नाँगे आवनु नाँगे जाना ॥

रागु भैरउ, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११५७

भगत कबीर – सबद १९६

मैला ब्रहमा मैला इंदु ॥

रागु भैरउ, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११५८

भगत कबीर – सबद १९७

मनु करि मका किबला करि देही ॥

रागु भैरउ, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११५८

भगत कबीर – सबद १९८

गंगा कै संगि सलिता बिगरी ॥

रागु भैरउ, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११५८

भगत कबीर – सबद १९९

माथे तिलकु हथि माला बानाँ ॥

रागु भैरउ, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११५८

भगत कबीर – सबद २००

उलटि जाति कुल दोऊ बिसारी ॥

रागु भैरउ, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११५८