भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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भगत कबीर सबद (३६१-३८०)

भगत कबीर – सबद ३६१

कबीरा रामु न चेतिओ जरा पहूँचिओ आइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१

भगत कबीर – सबद ३६२

कबीर कारनु सो भइओ जो कीनो करतारि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१

भगत कबीर – सबद ३६३

कबीर फल लागे फलनि पाकनि लागे आँब ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१

भगत कबीर – सबद ३६४

कबीर ठाकुरु पूजहि मोलि ले मनहठि तीरथ जाहि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१

भगत कबीर – सबद ३६५

कबीर पाहनु परमेसुरु कीआ पूजै सभु संसारु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१

भगत कबीर – सबद ३६६

कबीर कागद की ओबरी मसु के करम कपाट ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१

भगत कबीर – सबद ३६७

कबीर कालि करंता अबहि करु अब करता सुइ ताल ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१

भगत कबीर – सबद ३६८

कबीर ऐसा जंतु इकु देखिआ जैसी धोई लाख ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१

भगत कबीर – सबद ३६९

कबीर मेरी बुधि कउ जमु न करै तिसकार ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७१

भगत कबीर – सबद ३७०

कबीरु कसतूरी भइआ भवर भए सभ दास ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७२

भगत कबीर – सबद ३७१

कबीर गहगचि परिओ कुटंब कै काँठै रहि गइओ रामु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७२

भगत कबीर – सबद ३७२

कबीर साकत ते सूकर भला राखै आछा गाउ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७२

भगत कबीर – सबद ३७३

कबीर कउडी कउडी जोरि कै जोरे लाख करोरि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७२

भगत कबीर – सबद ३७४

कबीर बैसनो हूआ त किआ भइआ माला मेलीं चारि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७२

भगत कबीर – सबद ३७५

कबीर रोड़ा होइ रहु बाट का तजि मन का अभिमानु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७२

भगत कबीर – सबद ३७६

कबीर रोड़ा हूआ त किआ भइआ पंथी कउ दुखु देइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७२

भगत कबीर – सबद ३७७

कबीर खेह हूई तउ किआ भइआ जउ उडि लागै अंग ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७२

भगत कबीर – सबद ३७८

कबीर पानी हूआ त किआ भइआ सीरा ताता होइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७२

भगत कबीर – सबद ३७९

ऊच भवन कनकामनी सिखरि धजा फहराइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७२

भगत कबीर – सबद ३८०

कबीर पाटन ते ऊजरु भला राम भगत जिह ठाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७२