भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

सबदों की ऑडियो प्लेलिस्ट निर्धारित संगीत-शास्त्र में सुनें।

पृष्ठ ८

भगत कबीर सबद (१४१-१६०)

भगत कबीर – सबद १४१

ऐसो इहु संसारु पेखना रहनु न कोऊ पईहै रे ॥

रागु बिलावलु, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८५५

भगत कबीर – सबद १४२

बिदिआ न परउ बादु नही जानउ ॥

रागु बिलावलु, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८५५

भगत कबीर – सबद १४३

गृहु तजि बन खंड जाईऐ चुनि खाईऐ कंदा ॥

रागु बिलावलु, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८५५

भगत कबीर – सबद १४४

नित उठि कोरी गागरि आनै लीपत जीउ गइओ ॥

रागु बिलावलु, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८५६

भगत कबीर – सबद १४५

कोऊ हरि समानि नही राजा ॥

रागु बिलावलु, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८५६

भगत कबीर – सबद १४६

राखि लेहु हम ते बिगरी ॥

रागु बिलावलु, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८५६

भगत कबीर – सबद १४७

दरमादे ठाढे दरबारि ॥

रागु बिलावलु, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८५६

भगत कबीर – सबद १४८

डंडा मुँद्रा खिंथा आधारी ॥

रागु बिलावलु, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८५६

भगत कबीर – सबद १४९

इनि् माइआ जगदीस गुसाई तुम्मरे चरन बिसारे ॥

रागु बिलावलु, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८५७

भगत कबीर – सबद १५०

सरीर सरोवर भीतरे आछै कमल अनूप ॥

रागु बिलावलु, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८५७

भगत कबीर – सबद १५१

जनम मरन का भ्रमु गइआ गोबिद लिव लागी ॥

रागु बिलावलु, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८५७

भगत कबीर – सबद १५२

चरन कमल जा कै रिदै बसहि सो जनु किउ डोलै देव ॥

रागु बिलावलु, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८५७

भगत कबीर – सबद १५३

संतु मिलै किछु सुनीऐ कहीऐ ॥

रागु गोंड, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८७०

भगत कबीर – सबद १५४

नरू मरै नरु कामि न आवै ॥

रागु गोंड, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८७०

भगत कबीर – सबद १५५

आकासि गगनु पातालि गगनु है चहु दिसि गगनु रहाइले ॥

रागु गोंड, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८७०

भगत कबीर – सबद १५६

भुजा बाँधि भिला करि डारिओ ॥

रागु गोंड, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८७०

भगत कबीर – सबद १५७

ना इहु मानसु ना इहु देउ ॥

रागु गोंड, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८७१

भगत कबीर – सबद १५८

तूटे तागे निखुटी पानि ॥

रागु गोंड, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८७१

भगत कबीर – सबद १५९

खसमु मरै तउ नारि न रोवै ॥

रागु गोंड, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८७१

भगत कबीर – सबद १६०

गृहि सोभा जा कै रे नाहि ॥

रागु गोंड, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ८७२