भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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भगत कबीर सबद (६१-८०)

भगत कबीर – सबद ६१

जेते जतन करत ते डूबे भव सागरु नही तारिओ रे ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३५

भगत कबीर – सबद ६२

कालबूत की हसतनी मन बउरा रे चलतु रचिओ जगदीस ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३५

भगत कबीर – सबद ६३

अगनि न दहै पवनु नही मगनै तसकरु नेरि न आवै ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३६

भगत कबीर – सबद ६४

जिउ कपि के कर मुसटि चनन की लुबधि न तिआगु दइओ ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३६

भगत कबीर – सबद ६५

पानी मैला माटी गोरी ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३६

भगत कबीर – सबद ६६

राम जपउ जीअ ऐसे ऐसे ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३७

भगत कबीर – सबद ६७

जोनि छाडि जउ जग महि आइओ ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३७

भगत कबीर – सबद ६८

रे मन तेरो कोइ नही खिंचि लेइ जिनि भारु ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३७

भगत कबीर – सबद ६९

पंथु निहारै कामनी लोचन भरी ले उसासा ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३७

भगत कबीर – सबद ७०

आस पास घन तुरसी का बिरवा माझ बना रसि गाऊं रे ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३८

भगत कबीर – सबद ७१

मन रे छाडहु भरमु प्रगट होइ नाचहु इआ माइआ के डाँडे ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३८

भगत कबीर – सबद ७२

फुरमानु तेरा सिरै ऊपरि फिरि न करत बीचार ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३८

भगत कबीर – सबद ७३

लख चउरासीह जीअ जोनि महि भ्रमत नंदु बहु थाको रे ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३८

भगत कबीर – सबद ७४

निंदउ निंदउ मो कउ लोगु निंदउ ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३९

भगत कबीर – सबद ७५

राजा राम तूँ ऐसा निरभउ तरन तारन राम राइआ ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३९

भगत कबीर – सबद ७६

खट नेम करि कोठड़ी बाँधी बसतु अनूपु बीच पाई ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३९

भगत कबीर – सबद ७७

माई मोहि अवरु न जानिओ आनानाँ ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३९

भगत कबीर – सबद ७८

पंद्रह थितीं सात वार ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३४३

भगत कबीर – सबद ७९

बार बार हरि के गुन गावउ ॥

रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३४४

भगत कबीर – सबद ८०

गुर चरण लागि हम बिनवता पूछत कह जीउ पाइआ ॥

रागु आसा, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ४७५