भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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भगत कबीर सबद (४४१-४६०)

भगत कबीर – सबद ४४१

नामा माइआ मोहिआ कहै तिलोचनु मीत ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५

भगत कबीर – सबद ४४२

नामा कहै तिलोचना मुख ते रामु संम्मालि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५

भगत कबीर – सबद ४४३

कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६

भगत कबीर – सबद ४४४

कबीर कीचड़ि आटा गिरि परिआ किछू न आइओ हाथ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६

भगत कबीर – सबद ४४५

कबीर मनु जानै सभ बात जानत ही अउगनु करै ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६

भगत कबीर – सबद ४४६

कबीर लागी प्रीति सुजान सिउ बरजै लोगु अजानु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६

भगत कबीर – सबद ४४७

कबीर कोठे मंडप हेतु करि काहे मरहु सवारि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६

भगत कबीर – सबद ४४८

कबीर जो मै चितवउ ना करै किआ मेरे चितवे होइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६

भगत कबीर – सबद ४४९

कबीर रामु न चेतिओ फिरिआ लालच माहि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६

भगत कबीर – सबद ४५०

कबीर काइआ काची कारवी केवल काची धातु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६

भगत कबीर – सबद ४५१

कबीर केसो केसो कूकीऐ न सोईऐ असार ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६

भगत कबीर – सबद ४५२

कबीर काइआ कजली बनु भइआ मनु कुँचरु मय मंतु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६

भगत कबीर – सबद ४५३

कबीर राम रतनु मुखु कोथरी पारख आगै खोलि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६

भगत कबीर – सबद ४५४

कबीर राम नामु जानिओ नही पालिओ कटकु कुटंबु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६

भगत कबीर – सबद ४५५

कबीर आखी केरे माटुके पलु पलु गई बिहाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६

भगत कबीर – सबद ४५६

कबीर तरवर रूपी रामु है फल रूपी बैरागु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६

भगत कबीर – सबद ४५७

कबीर ऐसा बीजु बोइ बारह मास फलंत ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६

भगत कबीर – सबद ४५८

कबीर दाता तरवरु दया फलु उपकारी जीवंत ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६

भगत कबीर – सबद ४५९

कबीर साधू संगु परापती लिखिआ होइ लिलाट ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६

भगत कबीर – सबद ४६०

कबीर एक घड़ी आधी घरी आधी हूँ ते आध ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७७