भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ
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दार्शनिक गुरुओं के सबदों के रूपक संदेश
पृष्ठ २३
भगत कबीर सबद (४४१-४६०)
भगत कबीर – सबद ४४१
नामा माइआ मोहिआ कहै तिलोचनु मीत ॥
सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५
भगत कबीर – सबद ४४२
नामा कहै तिलोचना मुख ते रामु संम्मालि ॥
भगत कबीर – सबद ४४३
कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥
सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७६
भगत कबीर – सबद ४४४
कबीर कीचड़ि आटा गिरि परिआ किछू न आइओ हाथ ॥
भगत कबीर – सबद ४४५
कबीर मनु जानै सभ बात जानत ही अउगनु करै ॥
भगत कबीर – सबद ४४६
कबीर लागी प्रीति सुजान सिउ बरजै लोगु अजानु ॥
भगत कबीर – सबद ४४७
कबीर कोठे मंडप हेतु करि काहे मरहु सवारि ॥
भगत कबीर – सबद ४४८
कबीर जो मै चितवउ ना करै किआ मेरे चितवे होइ ॥
भगत कबीर – सबद ४४९
कबीर रामु न चेतिओ फिरिआ लालच माहि ॥
भगत कबीर – सबद ४५०
कबीर काइआ काची कारवी केवल काची धातु ॥
भगत कबीर – सबद ४५१
कबीर केसो केसो कूकीऐ न सोईऐ असार ॥
भगत कबीर – सबद ४५२
कबीर काइआ कजली बनु भइआ मनु कुँचरु मय मंतु ॥
भगत कबीर – सबद ४५३
कबीर राम रतनु मुखु कोथरी पारख आगै खोलि ॥
भगत कबीर – सबद ४५४
कबीर राम नामु जानिओ नही पालिओ कटकु कुटंबु ॥
भगत कबीर – सबद ४५५
कबीर आखी केरे माटुके पलु पलु गई बिहाइ ॥
भगत कबीर – सबद ४५६
कबीर तरवर रूपी रामु है फल रूपी बैरागु ॥
भगत कबीर – सबद ४५७
कबीर ऐसा बीजु बोइ बारह मास फलंत ॥
भगत कबीर – सबद ४५८
कबीर दाता तरवरु दया फलु उपकारी जीवंत ॥
भगत कबीर – सबद ४५९
कबीर साधू संगु परापती लिखिआ होइ लिलाट ॥
भगत कबीर – सबद ४६०
कबीर एक घड़ी आधी घरी आधी हूँ ते आध ॥
सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७७
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पृष्ठ २३: सबद (४४१-४६०)
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