भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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भगत कबीर सबद (४२१-४४०)

भगत कबीर – सबद ४२१

कबीर जा घर साध न सेवीअहि हरि की सेवा नाहि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४

भगत कबीर – सबद ४२२

कबीर गूँगा हूआ बावरा बहरा हूआ कान ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४

भगत कबीर – सबद ४२३

कबीर सतिगुर सूरमे बाहिआ बानु जु एकु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४

भगत कबीर – सबद ४२४

कबीर निरमल बूँद अकास की परि गई भूमि बिकार ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७४

भगत कबीर – सबद ४२५

कबीर निरमल बूँद अकास की लीनी भूमि मिलाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५

भगत कबीर – सबद ४२६

कबीर हज काबे हउ जाइ था आगै मिलिआ खुदाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५

भगत कबीर – सबद ४२७

कबीर हज काबै होइ होइ गइआ केती बार कबीर ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५

भगत कबीर – सबद ४२८

कबीर जीअ जु मारहि जोरु करि कहते हहि जु हलालु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५

भगत कबीर – सबद ४२९

कबीर जोरु कीआ सो जुलमु है लेइ जबाबु खुदाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५

भगत कबीर – सबद ४३०

कबीर लेखा देना सुहेला जउ दिल सूची होइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५

भगत कबीर – सबद ४३१

कबीर धरती अरु आकास महि दुइ तूँ बरी अबध ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५

भगत कबीर – सबद ४३२

कबीर मेरा मुझ महि किछु नही जो किछु है सो तेरा ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५

भगत कबीर – सबद ४३३

कबीर तूँ तूँ करता तू हूआ मुझ महि रहा न हूँ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५

भगत कबीर – सबद ४३४

कबीर बिकारह चितवते झूठे करते आस ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५

भगत कबीर – सबद ४३५

कबीर हरि का सिमरनु जो करै सो सुखीआ संसारि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५

भगत कबीर – सबद ४३६

कबीर घाणी पीड़ते सतिगुर लीए छडाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५

भगत कबीर – सबद ४३७

कबीर टालै टोलै दिनु गइआ बिआजु बढंतउ जाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५

भगत कबीर – सबद ४३८

कबीर कूकरु भउकना करंग पिछै उठि धाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५

भगत कबीर – सबद ४३९

कबीर धरती साध की तसकर बैसहि गाहि ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५

भगत कबीर – सबद ४४०

कबीर चावल कारने तुख कउ मुहली लाइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३७५