भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ
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दार्शनिक गुरुओं के सबदों के रूपक संदेश
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भगत कबीर सबद (४१ - ६०)
भगत कबीर – सबद ४१
जलि है सूतकु थलि है सूतकु सूतक ओपति होई ॥
रागु गउड़ी भी सोरठि भी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३१
भगत कबीर – सबद ४२
देखौ भाई ग्यान की आई आँधी ॥
रागु गउड़ी चेती, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३१
भगत कबीर – सबद ४३
हरि जसु सुनहि न हरि गुन गावहि ॥
रागु गउड़ी चेती, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३२
भगत कबीर – सबद ४४
जीवत पितर न मानै कोऊ मूएं सिराध कराही ॥
रागु गउड़ी बैरागणि, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३२
भगत कबीर – सबद ४५
उलटत पवन चक्र खटु भेदे सुरति सुँन अनरागी ॥
रागु गउड़ी बैरागणि, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३३
भगत कबीर – सबद ४६
जह कछु अहा तहा किछु नाही पंच ततु तह नाही ॥
रागु गउड़ी पूरबी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३४
भगत कबीर – सबद ४७
सुरग बासु न बाछीऐ डरीऐ न नरकि निवासु ॥
रागु गउड़ी पूरबी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३७
भगत कबीर – सबद ४८
बिपल बसत्र केते है पहिरे किआ बन मधे बासा ॥
रागु गउड़ी पूरबी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३८
भगत कबीर – सबद ४९
बावन अछर लोक त्रै सभु कछु इन ही माहि ॥
रागु गउड़ी पूरबी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३४०
भगत कबीर – सबद ५०
ना मै जोग धिआन चितु लाइआ ॥
रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३२९
भगत कबीर – सबद ५१
जिह सिरि रचि रचि बाधत पाग ॥
रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३०
भगत कबीर – सबद ५२
झगरा एकु निबेरहु राम ॥
रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३१
भगत कबीर – सबद ५३
जीवत मरै मरै फुनि जीवै ऐसे सुँनि समाइआ ॥
रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३२
भगत कबीर – सबद ५४
तह पावस सिंधु धूप नही छहीआ तह उतपति परलउ नाही ॥
रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३३
भगत कबीर – सबद ५५
पापु पुँनु दुइ बैल बिसाहे पवनु पूजी परगासिओ ॥
भगत कबीर – सबद ५६
पेवकड़ै दिन चारि है साहुरड़ै जाणा ॥
भगत कबीर – सबद ५७
जोगी कहहि जोगु भल मीठा अवरु न दूजा भाई ॥
रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३४
भगत कबीर – सबद ५८
सुरति सिमृति दुइ कंनी मुँदा परमिति बाहरि खिंथा ॥
भगत कबीर – सबद ५९
गज नव गज दस गज इकीस पुरीआ एक तनाई ॥
रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३५
भगत कबीर – सबद ६०
एक जोति एका मिली किंबा होइ महोइ ॥
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