भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ
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दार्शनिक गुरुओं के सबदों के रूपक संदेश
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भगत कबीर सबद (२१ - ४०)
भगत कबीर – सबद २१
जम ते उलटि भए है राम ॥
रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३२६
भगत कबीर – सबद २२
पिंडि मूऐ जीउ किह घरि जाता ॥
रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३२७
भगत कबीर – सबद २३
कंचन सिउ पाईऐ नही तोलि ॥
भगत कबीर – सबद २४
जिह मरनै सभु जगतु तरासिआ ॥
भगत कबीर – सबद २५
कत नही ठउर मूलु कत लावउ ॥
रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३२८
भगत कबीर – सबद २६
जा कै हरि सा ठाकुरु भाई ॥
भगत कबीर – सबद २७
बिनु सत सती होइ कैसे नारि ॥
भगत कबीर – सबद २८
बिखिआ बिआपिआ सगल संसारु ॥
भगत कबीर – सबद २९
जिह कुलि पूतु न गिआन बीचारी ॥
भगत कबीर – सबद ३०
जो जन लेहि खसम का नाउ ॥
भगत कबीर – सबद ३१
गगनि रसाल चुऐ मेरी भाठी ॥
भगत कबीर – सबद ३२
मन का सुभाउ मनहि बिआपी ॥
भगत कबीर – सबद ३३
ओइ जु दीसहि अंबरि तारे ॥
रागु गउड़ी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३२९
भगत कबीर – सबद ३४
बेद की पुत्री सिंमृति भाई ॥
भगत कबीर – सबद ३५
देइ मुहार लगामु पहिरावउ ॥
भगत कबीर – सबद ३६
जिह मुखि पाँचउ अंमृत खाए ॥
भगत कबीर – सबद ३७
आपे पावकु आपे पवना ॥
भगत कबीर – सबद ३८
रे जीअ निलज लाज तुोहि नाही ॥
रागु गउड़ी भी सोरठि भी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३०
भगत कबीर – सबद ३९
कउनु को पूतु पिता को का को ॥
भगत कबीर – सबद ४०
अब मो कउ भए राजा राम सहाई ॥
रागु गउड़ी भी सोरठि भी, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ३३१
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