भगत कबीर की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

सबदों की ऑडियो प्लेलिस्ट निर्धारित संगीत-शास्त्र में सुनें।

पृष्ठ १२

भगत कबीर सबद (२२१-२४०)

भगत कबीर – सबद २२१

माता जूठी पिता भी जूठा जूठे ही फल लागे ॥

रागु बसंतु हिंडोलु, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, ११९५

भगत कबीर – सबद २२२

कहा नर गरबसि थोरी बात ॥

रागु सारंग, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १२५१

भगत कबीर – सबद २२३

राजास्रम मिति नही जानी तेरी ॥

रागु सारंग, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १२५२

भगत कबीर – सबद २२४

हरि बिनु कउनु सहाई मन का ॥

रागु सारंग, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १२५३

भगत कबीर – सबद २२५

मरन जीवन की संका नासी ॥

रागु बिभास प्रभाती, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३४९

भगत कबीर – सबद २२६

अलहु एकु मसीति बसतु है अवरु मुलखु किसु केरा ॥

रागु प्रभाती, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३४९

भगत कबीर – सबद २२७

अवलि अलह नूरु उपाइआ कुदरति के सभ बंदे ॥

रागु प्रभाती, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३४९

भगत कबीर – सबद २२८

बेद कतेब कहहु मत झूठे झूठा जो न बिचारै ॥

रागु प्रभाती, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३५०

भगत कबीर – सबद २२९

सुँन संधिआ तेरी देव देवाकर अधपति आदि समाई ॥

रागु प्रभाती, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३५०

भगत कबीर – सबद २३०

कबीर मेरी सिमरनी रसना ऊपरि रामु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६४

भगत कबीर – सबद २३१

कबीर मेरी जाति कउ सभु को हसनेहारु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६४

भगत कबीर – सबद २३२

कबीर डगमग किआ करहि कहा डुलावहि जीउ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६४

भगत कबीर – सबद २३३

कबीर कंचन के कुँडल बने ऊपरि लाल जड़ाउ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६४

भगत कबीर – सबद २३४

कबीर ऐसा एकु आधु जो जीवत मिरतकु होइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६४

भगत कबीर – सबद २३५

कबीर जा दिन हउ मूआ पाछै भइआ अनंदु ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६४

भगत कबीर – सबद २३६

कबीर सभ ते हम बुरे हम तजि भलो सभु कोइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६४

भगत कबीर – सबद २३७

कबीर आई मुझहि पहि अनिक करे करि भेस ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६४

भगत कबीर – सबद २३८

कबीर सोई मारीऐ जिह मूऐ सुखु होइ ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६४

भगत कबीर – सबद २३९

कबीर राती होवहि कारीआ कारे ऊभे जंत ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६४

भगत कबीर – सबद २४०

कबीर चंदन का बिरवा भला बेड़ि्ओ ढाक पलास ॥

सलोक, भगत कबीर, गुरु ग्रंथ साहिब, १३६५