भगत रविदास का जीवन और रूपक संदेश

भगत रविदास का जन्म १४१४ ईस्वी में मोची परिवार में हुआ था जिसे जाति पदानुक्रम में अछूत जाति माना जाता है। उन्होंने पुरोहित वर्ग के इस विचार का कड़ा विरोध किया कि मनुष्य के निरंकार के साथ संबंधों में जाति कोई बुनियादी भूमिका निभाती है।

 

भगत रविदास का रूहानी संदेश गुरु ग्रंथ साहिब में उनके ४॰ सबदों में दर्ज है।

शिक्षा संसाधन - भगत रविदास।

पृष्ठ १

भगत रविदास सबद (१ - २०)

भगत रविदास – सबद १

तोही मोही मोही तोही अंतरु कैसा ॥

रागु सिरीरागु, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ९३

भगत रविदास – सबद २

मेरी संगति पोच सोच दिनु राती ॥

रागु गउड़ी गुआरेरी, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ३४५

भगत रविदास – सबद ३

बेगम पुरा सहर को नाउ ॥

रागु गउड़ी गुआरेरी, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ३४५

भगत रविदास – सबद ४

घट अवघट डूगर घणा इकु निरगुणु बैलु हमार ॥

रागु गउड़ी बैरागणि, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ३४५

भगत रविदास – सबद ५

सतजुगि सतु तेता जगी दुआपरि पूजाचार ॥

रागु गउड़ी बैरागणि, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ३४६

भगत रविदास – सबद ६

कूपु भरिओ जैसे दादिरा कछु देसु बिदेसु न बूझ ॥

रागु गउड़ी पूरबी, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ३४६

भगत रविदास – सबद ७

म्रिग मीन भ्रिंग पतंग कुंचर एक दोख बिनास ॥

रागु आसा, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८६

भगत रविदास – सबद ८

संत तुझी तनु संगति प्रान ॥

रागु आसा, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८६

भगत रविदास – सबद ९

तुम चंदन हम इरंड बापुरे संगि तुमारे बासा ॥

रागु आसा, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८६

भगत रविदास – सबद १०

कहा भइओ जउ तनु भइओ छिनु छिनु ॥

रागु आसा, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८६

भगत रविदास – सबद ११

हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे ॥

रागु आसा, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८७

भगत रविदास – सबद १२

माटी को पुतरा कैसे नचतु है ॥

रागु आसा, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ४८७

भगत रविदास – सबद १३

दूधु त बछरै थनहु बिटारिओ ॥

रागु आसा, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ५२५

भगत रविदास – सबद १४

जब हम होते तब तू नाही अब तूही मै नाही ॥

रागु सोरठि, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ६५७

भगत रविदास – सबद १५

जउ हम बांधे मोह फास हम प्रेम बधनि तुम बाधे ॥

रागु सोरठि, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ६५८

भगत रविदास – सबद १६

दुलभ जनमु पुंन फल पाइओ बिरथा जात अबिबेकै ॥

रागु सोरठि, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ६५८

भगत रविदास – सबद १७

सुख सागरु सुरतर चिंतामनि कामधेनु बसि जा के ॥

रागु सोरठि, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ६५८

भगत रविदास – सबद १८

जउ तुम गिरिवर तउ हम मोरा ॥

रागु सोरठि, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ६५८

भगत रविदास – सबद १९

जल की भीति पवन का थ्मभा रक्त बुंद का गारा ॥

रागु सोरठि, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ६५९

भगत रविदास – सबद २०

चमरटा गांठि न जनई ॥

रागु सोरठि, भगत रविदास, गुरु ग्रंथ साहिब, ६५९