गुरु नानक की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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गुरु नानक सबद (१८१-२००)

गुरु नानक – सबद १८१

सतिगुरु होइ दइआलु त सरधा पूरीऐ ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४९

गुरु नानक – सबद १८२

सिरु खोहाइ पीअहि मलवाणी जूठा मंगि मंगि खाही ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४९

गुरु नानक – सबद १८३

तुधु सचे सुबहानु सदा कलाणिआ ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १५०

गुरु नानक – सबद १८४

आपि बुझाए सोई बूझै ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १५०

गुरु नानक – सबद १८५

हउ ढाढी वेकारु कारै लाइआ ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १५०

गुरु नानक – सबद १८६

जै घरि कीरति आखीऐ करते का होइ बीचारो ॥

रागु गउड़ी दीपकी, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १२

गुरु नानक – सबद १८७

भउ मुचु भारा वडा तोलु ॥

रागु गउड़ी गुआरेरी, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १५१

गुरु नानक – सबद १८८

निधि सिधि निरमल नामु बीचारु ॥

रागु गउड़ी गुआरेरी, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, २२०

गुरु नानक – सबद १८९

मनु कुँचरु काइआ उदिआनै ॥

रागु गउड़ी गुआरेरी, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, २२१

गुरु नानक – सबद १९०

ना मनु मरै न कारजु होइ ॥

रागु गउड़ी गुआरेरी, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, २२२

गुरु नानक – सबद १९१

हउमै करतिआ नह सुखु होइ ॥

रागु गउड़ी गुआरेरी, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, २२२

गुरु नानक – सबद १९२

अंमृत काइआ रहै सुखाली बाजी इहु संसारो ॥

रागु गउड़ी चेती, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १५४

गुरु नानक – सबद १९३

अवरि पंच हम एक जना किउ राखउ घर बारु मना ॥

रागु गउड़ी चेती, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १५५

गुरु नानक – सबद १९४

मुँद्रा ते घट भीतरि मुँद्रा काँइआ कीजै खिंथाता ॥

रागु गउड़ी चेती, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १५५

गुरु नानक – सबद १९५

अउखध मंत्र मूलु मन एकै जे करि दृड़ु चितु कीजै रे ॥

रागु गउड़ी चेती, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १५६

गुरु नानक – सबद १९६

कत की माई बापु कत केरा किदू थावहु हम आए ॥

रागु गउड़ी चेती, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १५६

गुरु नानक – सबद १९७

रैणि गवाई सोइ कै दिवसु गवाइआ खाइ ॥

रागु गउड़ी बैरागणि, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १५६

गुरु नानक – सबद १९८

हरणी होवा बनि बसा कंद मूल चुणि खाउ ॥

रागु गउड़ी बैरागणि, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १५७

गुरु नानक – सबद १९९

जिउ गाई कउ गोइली राखहि करि सारा ॥

रागु गउड़ी बैरागणि, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, २२८

गुरु नानक – सबद २००

जै घरि कीरति आखीऐ करते का होइ बीचारो ॥

रागु गउड़ी पूरबी दीपकी, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १५७