गुरु नानक की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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गुरु नानक सबद (२८१-३००)

गुरु नानक – सबद २८१

एकु मरै पंचे मिलि रोवहि ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४१२

गुरु नानक – सबद २८२

आपु वीचारै सु परखे हीरा ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४१३

गुरु नानक – सबद २८३

गुरमुखि गिआनु धिआनु मनि मानु ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४१४

गुरु नानक – सबद २८४

गावहि गीते चीति अनीते ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४१४

गुरु नानक – सबद २८५

मनु मैगलु साकतु देवाना ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४१५

गुरु नानक – सबद २८६

तनु बिनसै धनु का को कहीऐ ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४१६

गुरु नानक – सबद २८७

गुरु सेवे सो ठाकुर जानै ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४१६

गुरु नानक – सबद २८८

जिन सिरि सोहनि पटीआ माँगी पाइ संधूरु ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४१७

गुरु नानक – सबद २८९

कहा सु खेल तबेला घोड़े कहा भेरी सहनाई ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४१७

गुरु नानक – सबद २९०

जैसे गोइलि गोइली तैसे संसारा ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४१८

गुरु नानक – सबद २९१

चारे कुँडा ढूढीआ को नीम्मी मैडा ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४१८

गुरु नानक – सबद २९२

मनसा मनहि समाइले भउजलु सचि तरणा ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४१९

गुरु नानक – सबद २९३

चले चलणहार वाट वटाइआ ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४१९

गुरु नानक – सबद २९४

किआ जंगलु ढूढी जाइ मै घरि बनु हरीआवला ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४२०

गुरु नानक – सबद २९५

जिन्नी नामु विसारिआ दूजै भरमि भुलाई ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४२०

गुरु नानक – सबद २९६

रूड़ो ठाकुर माहरो रूड़ी गुरबाणी ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४२१

गुरु नानक – सबद २९७

केता आखणु आखीऐ ता के अंत न जाणा ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४२१

गुरु नानक – सबद २९८

मनु रातउ हरि नाइ सचु वखाणिआ ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४२१

गुरु नानक – सबद २९९

आवण जाणा किउ रहै किउ मेला होई ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४२२

गुरु नानक – सबद ३००

ससै सोइ सृसटि जिनि साजी सभना साहिबु एकु भइआ ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४३२