गुरु नानक की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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गुरु नानक सबद (५८१-६००)

गुरु नानक - सबद ५८१

पवन अरंभु सतिगुर मति वेला ॥

राग रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४३

गुरु नानक - सबद ५८२

मैण के दंत किउ खाईऐ सारु ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४३

गुरु नानक - सबद ५८३

सच भै राता गरबु निवारै ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४३

गुरु नानक - सबद ५८४

कवन मुखि चंदु हिवै घरु छाइआ ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४३

गुरु नानक - सबद ५८५

सबदु भाखत ससि जोति अपारा ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४३

गुरु नानक - सबद ५८६

नाम ततु सभ ही सिरि जापै ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४३

गुरु नानक - सबद ५८७

अंतरि सुँनं बाहरि सुँनं तृभवण सुँन मसुँनं ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४३

गुरु नानक - सबद ५८८

सुँनो सुँनु कहै सभु कोई ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४३

गुरु नानक - सबद ५८९

नउ सर सुभर दसवै पूरे ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४३

गुरु नानक - सबद ५९०

सहज भाइ मिलीऐ सुखु होवै ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४४

गुरु नानक - सबद ५९१

कुबुधि चवावै सो कितु ठाइ ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४४

गुरु नानक - सबद ५९२

कुबुधि मिटै गुर सबदु बीचारि ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४४

गुरु नानक - सबद ५९३

साचु वखरु धनु पलै होइ ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४४

गुरु नानक - सबद ५९४

मन का जीउ पवनु कथीअले पवनु कहा रसु खाई ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४४

गुरु नानक - सबद ५९५

सु सबद कउ निरंतरि वासु अलखं जह देखा तह सोई ॥

राग रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४४

गुरु नानक - सबद ५९६

त्रै सत अंगुल वाई अउधू सुँन सचु आहारो ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४४

गुरु नानक - सबद ५९७

मन का जीउ पवनु कथीअले पवनु कहा रसु खाई ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४४

गुरु नानक - सबद ५९८

रंगि न राता रसि नही माता ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४५

गुरु नानक - सबद ५९९

गुर परसादी रंगे राता ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४५

गुरु नानक - सबद ६००

इहु मनु मैगलु कहा बसीअले कहा बसै इहु पवना ॥

रागु रामकली, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ९४५