गुरु नानक की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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गुरु नानक सबद (२४१-२६०)

गुरु नानक – सबद २४१

जे दरि माँगतु कूक करे महली खसमु सुणे ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३४९

गुरु नानक – सबद २४२

ताल मदीरे घट के घाट ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३४९

गुरु नानक – सबद २४३

जेता सबदु सुरति धुनि तेती जेता रूपु काइआ तेरी ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५०

गुरु नानक – सबद २४४

वाजा मति पखावजु भाउ ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५०

गुरु नानक – सबद २४५

पउणु उपाइ धरी सभ धरती जल अगनी का बंधु कीआ ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५०

गुरु नानक – सबद २४६

करम करतूति बेलि बिसथारी राम नामु फलु हूआ ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५१

गुरु नानक – सबद २४७

मै गुण गला के सिरि भार ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५१

गुरु नानक – सबद २४८

करि किरपा अपनै घरि आइआ ता मिलि सखीआ काजु रचाइआ ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५१

गुरु नानक – सबद २४९

गृहु बनु समसरि सहजि सुभाइ ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५१

गुरु नानक – सबद २५०

एको सरवरु कमल अनूप ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५२

गुरु नानक – सबद २५१

गुरमति साची हुजति दूरि ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५२

गुरु नानक – सबद २५२

जो तिनि कीआ सो सचु थीआ ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५२

गुरु नानक – सबद २५३

इकि आवहि इकि जावहि आई ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५३

गुरु नानक – सबद २५४

निवि निवि पाइ लगउ गुर अपुने आतम रामु निहारिआ ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५३

गुरु नानक – सबद २५५

किस कउ कहहि सुणावहि किस कउ किसु समझावहि समझि रहे ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५३

गुरु नानक – सबद २५६

कोई भीखकु भीखिआ खाइ ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५४

गुरु नानक – सबद २५७

दुध बिनु धेनु पंख बिनु पंखी जल बिनु उतभुज कामि नाही ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५४

गुरु नानक – सबद २५८

काइआ ब्रहमा मनु है धोती ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५५

गुरु नानक – सबद २५९

सेवकु दासु भगतु जनु सोई ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५५

गुरु नानक – सबद २६०

काची गागरि देह दुहेली उपजै बिनसै दुखु पाई ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५५