गुरु नानक की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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गुरु नानक सबद (२६१-२८०)

गुरु नानक – सबद २६१

मोहु कुटंबु मोहु सभ कार ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५६

गुरु नानक – सबद २६२

आपि करे सचु अलख अपारु ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५६

गुरु नानक – सबद २६३

विदिआ वीचारी ताँ परउपकारी ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५६

गुरु नानक – सबद २६४

एक न भरीआ गुण करि धोवा ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५६

गुरु नानक – सबद २६५

पेवकड़ै धन खरी इआणी ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५७

गुरु नानक – सबद २६६

न किस का पूतु न किस की माई ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५७

गुरु नानक – सबद २६७

तितु सरवरड़ै भईले निवासा पाणी पावकु तिनहि कीआ ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५७

गुरु नानक – सबद २६८

छिअ घर छिअ गुर छिअ उपदेस ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५७

गुरु नानक – सबद २६९

लख लसकर लख वाजे नेजे लख उठि करहि सलामु ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५८

गुरु नानक – सबद २७०

दीवा मेरा एकु नामु दुखु विचि पाइआ तेलु ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५८

गुरु नानक – सबद २७१

देवतिआ दरसन कै ताई दूख भूख तीरथ कीए ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५८

गुरु नानक – सबद २७२

भीतरि पंच गुपत मनि वासे ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५९

गुरु नानक – सबद २७३

मनु मोती जे गहणा होवै पउणु होवै सूत धारी ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५९

गुरु नानक – सबद २७४

कीता होवै करे कराइआ तिसु किआ कहीऐ भाई ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५९

गुरु नानक – सबद २७५

गुर का सबदु मनै महि मुँद्रा खिंथा खिमा हढावउ ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३५९

गुरु नानक – सबद २७६

गुड़ु करि गिआनु धिआनु करि धावै करि करणी कसु पाईऐ ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३६०

गुरु नानक – सबद २७७

खुरासान खसमाना कीआ हिंदुसतानु डराइआ ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ३६०

गुरु नानक – सबद २७८

उतरि अवघटि सरवरि न्नावै ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४११

गुरु नानक – सबद २७९

सभि जप सभि तप सभ चतुराई ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४११

गुरु नानक – सबद २८०

लेख असंख लिखि लिखि मानु ॥

रागु आसा, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, ४१२