गुरु नानक की रचनाओं की रूपकात्मक व्याख्याएँ और निर्धारित संगीत-शास्त्र में प्रस्तुतियाँ

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गुरु नानक सबद (१६१-१८०)

गुरु नानक - सबद १६१

सतिगुरु सेवि निसंगु भरमु चुकाईऐ ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४५

गुरु नानक - सबद १६२

कलि काती राजे कासाई धरमु पंख करि उडरिआ ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४५

गुरु नानक - सबद १६३

भगता तै सैसारीआ जोड़ु कदे न आइआ ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४५

गुरु नानक - सबद १६४

सबाही सालाह जिनी धिआइआ इक मनि ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४५

गुरु नानक - सबद १६५

जा तूँ ता किआ होरि मै सचु सुणाईऐ ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४६

गुरु नानक - सबद १६६

सचा भोजनु भाउ सतिगुरि दसिआ ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४६

गुरु नानक - सबद १६७

पहिरा अगनि हिवै घरु बाधा भोजनु सारु कराई ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४७

गुरु नानक - सबद १६८

विणु सचे सभु कूड़ु कूड़ु कमाईऐ ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४७

गुरु नानक - सबद १६९

नानक गुरु संतोखु रुखु धरमु फुलु फल गिआनु ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४७

गुरु नानक - सबद १७०

सुइने का बिरखु पत परवाला फुल जवेहर लाल ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४७

गुरु नानक – सबद १७१

जीवदिआ मरु मारि न पछोताईऐ ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४७

गुरु नानक – सबद १७२

तुमी तुमा विसु अकु धतूरा निमु फलु ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४७

गुरु नानक – सबद १७३

मति पंखेरू किरतु साथि कब उतम कब नीच ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४७

गुरु नानक – सबद १७४

केते कहहि वखाण कहि कहि जावणा ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४८

गुरु नानक – सबद १७५

नारी पुरख पिआरु प्रेमि सीगारीआ ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४८

गुरु नानक – सबद १७६

मारू मीहि न तृपतिआ अगी लहै न भुख ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४८

गुरु नानक – सबद १७७

खसमै कै दरबारि ढाढी वसिआ ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४८

गुरु नानक – सबद १७८

खतिअहु जंमे खते करनि त खतिआ विचि पाहि ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४९

गुरु नानक – सबद १७९

नानक बोलणु झखणा दुख छडि मंगीअहि सुख ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४९

गुरु नानक – सबद १८०

चारे कुँडा देखि अंदरु भालिआ ॥

रागु माझ, गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, १४९